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पुलवामा 2019: 14 फ़रवरी का आत्मघाती हमला — 100 फॉरेंसिक तथ्य, NIA चार्जशीट के साक्ष्य और अनसुलझे सुरक्षा सवाल
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पुलवामा 2019: 14 फ़रवरी का आत्मघाती हमला — 100 फॉरेंसिक तथ्य, NIA चार्जशीट के साक्ष्य और अनसुलझे सुरक्षा सवाल

14 फ़रवरी 2019 को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) पर लेथपोरा के पास सीआरपीएफ के काफिले पर हुआ आत्मघाती हमला स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे घातक आतंकी हमलों में से एक था, जिसमें 40 बहादुर जवान शहीद हुए। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की 13,500 पन्नों की चार्जशीट, फॉरेंसिक टॉक्सिकोलॉजी, बारूदी केमिकल विश्लेषण, खुफिया इनपुट्स और भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर आधारित 100 अकाट्य तथ्यों का सम्पूर्ण फॉरेंसिक ऑडिट प्रस्तुत है।

लेखक: 5StarBaba संपादकीय डेस्क · प्रकाशित 12 Oct 2026

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§1 काफिले का आकार, मौसम की मजबूरी और रूट प्रोटोकॉल (तथ्य 1 से 12)

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14 फ़रवरी 2019 को जम्मू के ट्रांजिट कैंप से श्रीनगर के लिए रवाना हुए सीआरपीएफ (CRPF) के काफिले में कुल 78 वाहन शामिल थे।

इस काफिले में विभिन्न बटालियनों के कुल 2,547 जवान और अधिकारी ड्यूटी जॉइन करने के लिए एक साथ यात्रा कर रहे थे।

आमतौर पर सुरक्षा कारणों से इतने बड़े काफिले एक साथ नहीं चलते, परंतु खराब मौसम, बर्फबारी और भूस्खलन के कारण NH-44 पिछले 3 दिनों (8, 9 और 11 फ़रवरी) से बंद था, जिससे जम्मू में जवानों का भारी बैक-लॉग जमा हो गया था।

काफिला तड़के करीब 3:30 बजे जम्मू से रवाना हुआ था और इसे दोपहर बाद श्रीनगर पहुंचना निर्धारित था।

जिस 5वीं बस को निशाना बनाया गया, वह 76वीं बटालियन की मिनी-बस थी (रजिस्ट्रेशन नंबर HR 49 F 0637), जिसमें चालक सहित 40 जवान सवार थे।

जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) पर सुरक्षा का मानक संचालन प्रोटोकॉल (SOP) 'रोड ओपनिंग पार्टी' (ROP) द्वारा हर सुबह पूरे रूट की स्कैनिंग करने का होता है।

घटना वाले दिन ROP पूरी तरह तैनात थी, परंतु सुरक्षा केवल हाईवे की मुख्य लेन पर केंद्रित थी, साइड रोड्स (Lateral Entry Points) से आने वाले निजी वाहनों की अनिवार्य शारीरिक बैरिकेडिंग उस समय मौजूद नहीं थी।

हमले का स्थान अवंतीपोरा के पास लेथपोरा था, जहां हाईवे पर दोनों दिशाओं में डिवाइडर और सर्विस लेन का एक कट मौजूद था।

घटना के समय मौसम बेहद ठंडा था और सड़क पर हल्का कोहरा था, हालांकि दोपहर 3:15 बजे विजिबिलिटी सामान्य थी।

सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुसार, सैन्य काफिले के गुजरने के दौरान नागरिक वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का कोई सख्त नियम उस समय लागू नहीं था।

जवानों को सड़क मार्ग के बजाय हवाई मार्ग (Airlift) से भेजने का औपचारिक प्रशासनिक अनुरोध गृह मंत्रालय में लंबित होने का मुद्दा बाद में संसदीय बहसों और कैग (CAG) टिप्पणियों में उठा।

लेथपोरा में घटनास्थल श्रीनगर से मात्र 27 किलोमीटर पहले था, यानी काफिला अपनी यात्रा के अंतिम चरण में था।
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§2 मारुति ईको कार, रूट मैपिंग और मॉडिफिकेशन (तथ्य 13 से 25)

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हमले में इस्तेमाल किया गया वाहन एक लाल रंग की मारुति ईको (Maruti Eeco) कार थी।

इस कार को आतंकियों ने नवंबर 2018 से फ़रवरी 2019 के बीच काकापोरा के हाजीबल गांव में स्थित एक गुप्त ठिकाने पर छुपाकर रखा था।

कार का खरीदार जैश-ए-मोहम्मद का स्थानीय मददगार सज्जाद भट (निवासी बिजबिहाड़ा) था, जिसने हमले से ठीक 10 दिन पहले 4 फ़रवरी 2019 को यह कार खरीदी थी।

NIA की पड़ताल के अनुसार, यह कार 2011 में पहली बार बेची गई थी और 2019 तक 7 अलग-अलग हाथों से गुजर चुकी थी, जिसमें से अधिकांश ने आरटीओ (RTO) में वाहन का आधिकारिक स्वामित्व ट्रांसफर ही नहीं कराया था।

कार के सस्पेंशन और शॉकर्स को स्थानीय वर्कशॉप से इस तरह मॉडिफाई कराया गया था कि वह 200 किलो से अधिक अतिरिक्त वजन ले जाने पर भी पीछे से न झुके और हाईवे पर सामान्य दिखे।

कार की पिछली सीटों को हटाकर वहां भारी प्लास्टिक के जेरी-कैन और विस्फोटक फिट करने के लिए लकड़ी के खांचे बनाए गए थे।

कार में विस्फोटक और डेटोनेटर की वायरिंग को स्टीयरिंग और डैशबोर्ड के नीचे एक साधारण पुश-बटन स्विच से जोड़ा गया था।

14 फ़रवरी की सुबह, मुख्य साजिशकर्ता शाकिर बशीर माग्रे खुद उस कार को चलाकर नेशनल हाईवे के पास तक लाया था, क्योंकि वह स्थानीय रास्तों से भलीभांति परिचित था।

हाईवे से 500 मीटर पहले शाकिर बशीर ने कार की ड्राइविंग सीट आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार को सौंप दी और खुद सुरक्षित स्थान पर चला गया।

कार दोपहर 3:10 बजे एक कच्ची लिंक रोड से NH-44 पर विपरीत दिशा (wrong side/parallel lane) से दाखिल हुई।

कार पर उस समय एक फर्जी नंबर प्लेट लगी हुई थी, जिसका मिलान किसी वास्तविक वाहन से नहीं था।

कार ने काफिले की 4 बसों को ओवरटेक किया और सीधे 5वीं बस के बाएं हिस्से में जोरदार टक्कर मार दी।

विस्फोट इतना तीव्र था कि मारुति ईको कार के लोहे के टुकड़े 500 से 800 मीटर के दायरे में खेतों और दुकानों की छतों पर बिखरे पाए गए।
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§3 आईईडी संरचना, RDX का केमिकल फॉरेंसिक और बारूद का स्रोत (तथ्य 26 से 38)

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राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) और केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL, चंडीगढ़) के अनुसार, हमले में लगभग 160 से 200 किलोग्राम इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) का इस्तेमाल हुआ था।

रासायनिक विश्लेषण में पुष्ट हुआ कि मुख्य विस्फोटक पाकिस्तान निर्मित सैन्य-ग्रेड आरडीएक्स (Military Grade RDX) था।

RDX के प्रभाव और आग को तीव्र करने के लिए उसमें भारी मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट (Ammonium Nitrate) और स्थानीय खदानों से जुटाया गया जिलेटिन (Gelatin sticks / Nitroglycerin) मिलाया गया था।

केमिकल फॉरेंसिक में थर्मल इग्निशन और शॉकवेव को 3000 मीटर प्रति सेकंड से ऊपर ले जाने के लिए बारीक एल्युमिनियम पाउडर (Aluminium Powder) का साक्ष्य मिला।

आरडीएक्स को सीमा पार पाकिस्तान से छोटे-छोटे पैकेटों में जैश के घुसपैठियों द्वारा 2018 के अंत में सांबा और हीरानगर सेक्टर की अंतरराष्ट्रीय सीमा के जरिए भारत में तस्करी किया गया था।

अमोनियम नाइट्रेट और डेटोनेटिंग कॉर्ड्स को स्थानीय फर्टिलाइजर दुकानों और अवैध पत्थर खदानों से स्थानीय नेटवर्क के जरिए टुकड़ों-टुकड़ों में खरीदा गया था।

विस्फोट स्थल पर सड़क में लगभग 1.5 मीटर गहरा और 3 मीटर चौड़ा विशाल गड्ढा (Blast Crater) बन गया था।

विस्फोटक को दो अलग-अलग जेरी-कैन (एक 25 लीटर और एक 30 लीटर) में सममित तरीके से पैक किया गया था ताकि विस्फोट की ऊर्जा सामने की ओर सीधे बस की बॉडी पर केंद्रित हो (Shaped Charge Principle)।

डेटोनेशन के लिए इलेक्ट्रिक ब्लास्टिंग कैप्स और 9-वोल्ट की उच्च क्षमता वाली बैटरियों का बैकअप सर्किट बनाया गया था।

विस्फोट के समय निकलने वाली गर्मी और दबाव इतना अत्यधिक था कि बस का मुख्य स्टील फ्रेम चंद मिलीसेकंड में पिघलकर मुड़ गया।

फोरेंसिक जांच में यह भी सामने आया कि धमाके में छर्रों के रूप में स्टील की कीलें और नट-बोल्ट भी भरे गए थे ताकि मानव शरीर पर घातक प्रभाव बढ़ सके।

बारूद की गंध और रासायनिक अवशेष घटना के 48 घंटे बाद भी मिट्टी और पेड़ों की पत्तियों पर सक्रिय रूप से दर्ज किए गए।

एनएसजी (NSG) की पोस्ट-ब्लास्ट इन्वेस्टिगेशन यूनिट ने पुष्टि की कि इतनी उच्च क्षमता वाला चार्ज केवल किसी प्रशिक्षित सैन्य इंजीनियर या अल-कायदा/तालिबान प्रशिक्षित आईईडी विशेषज्ञ द्वारा ही असेंबल किया जा सकता था।
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§4 आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार और जैश का नेटवर्क (तथ्य 39 से 50)

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आत्मघाती हमलावर का नाम आदिल अहमद डार था, जो पुलवामा जिले के काकापोरा गांव के गुंडीबाग का निवासी था और उसकी उम्र मात्र 20 वर्ष थी।

डार ने 12वीं की पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी और वह स्थानीय आरा-मशीन (saw mill) पर काम करता था।

मार्च 2018 में वह अचानक अपने घर से लापता हो गया था, जिसके बाद उसके परिजनों ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

गायब होने के कुछ ही हफ्तों बाद उसकी एके-47 राइफल के साथ तस्वीर सोशल मीडिया पर आई, जहां उसका कोडनेम 'वकास कमांडो' रखा गया था।

डार का कोई बड़ा आपराधिक या आतंकी रिकॉर्ड पुलिस फाइलों में नहीं था; उसे सी-कैटेगरी (कम जोखिम वाले स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर) के रूप में वर्गीकृत किया गया था।

हमले के मात्र 20 मिनट बाद जैश-ए-मोहम्मद ने एक पूर्व-रिकॉर्डेड वीडियो जारी किया, जिसमें डार जैश के झंडे और भारी हथियारों के सामने बैठा हमले की जिम्मेदारी ले रहा था।

वीडियो की फॉरेंसिक जांच से पता चला कि यह वीडियो हमले से कम से कम 10 से 15 दिन पहले एक बंद कमरे में शूट किया गया था।

वीडियो में डार ने कश्मीरी और उर्दू भाषा में भाषण दिया था, जिसकी स्क्रिप्ट पाकिस्तान स्थित जैश प्रचारकों द्वारा तैयार की गई थी।

डार को पिछले 6 महीनों तक घाटी के विभिन्न सेब के बागों और घरों में छिपाकर रखा गया था ताकि वह सेना की नजरों से बच सके।

विस्फोट के बाद घटनास्थल से डार के शरीर का कोई ठोस हिस्सा नहीं बचा था; केवल जबड़े का एक टुकड़ा और दांत का सिरा मिला।

काकापोरा में रहने वाले डार के माता-पिता के डीएनए (DNA) सैंपल लिए गए, जिनका मिलान घटनास्थल से मिले उस जबड़े के टुकड़े से 100% पॉजिटिव हुआ।

डार का अंतिम वीडियो ऑनलाइन अपलोड करने का आईपी एड्रेस (IP Address) रावलपिंडी और बहावलपुर (पाकिस्तान) के प्रॉक्सी सर्वरों से जुड़ा पाया गया।
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§5 पाकिस्तान स्थित मुख्य साजिशकर्ता और अफगानिस्तान का लिंक (तथ्य 51 से 63)

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हमले का मुख्य मास्टरमाइंड मोहम्मद उमर फारूक था, जो जैश प्रमुख मौलाना मसूद अजहर का सगा भतीजा और इब्राहिम अतहर का बेटा था (इब्राहिम अतहर 1999 के कंधार IC-814 विमान अपहरण का मुख्य अपहरणकर्ता था)।

उमर फारूक को 2016-17 में अफगानिस्तान के हेलमंद और कंधार प्रांत में नाटो बलों के खिलाफ युद्ध लड़ने और तालिबान कैंप्स में उच्च-स्तरीय आईईडी बनाने का गहन प्रशिक्षण मिला था।

फारूक अप्रैल 2018 में सांबा सेक्टर से अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर भारत में घुसा था और उसे पूरे पुलवामा हमले को अंजाम देने के लिए 10 लाख रुपये (पाकिस्तानी मुद्रा) बैंक खातों और हवाला के जरिए भेजे गए थे।

हमले के अन्य मुख्य पाकिस्तानी साजिशकर्ताओं में अम्मार अल्वी (मसूद अजहर का भाई) और मुफ्ती अब्दुल रऊफ असगर शामिल थे, जो जैश की खुफिया विंग के प्रमुख थे।

घाटी में जैश का मुख्य ऑपरेशनल कमांडर कामरान उर्फ 'गाजी' था, जो पाकिस्तानी नागरिक था और हमले की पूरी ग्राउंड लॉजिस्टिक्स संभाल रहा था।

कामरान गाजी को हमले के ठीक 4 दिन बाद (18 फ़रवरी 2019) पिंगलान (पुलवामा) में एक भीषण मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने मार गिराया, जिसमें मेजर विभूति ढौंडियाल सहित 4 सैन्यकर्मी शहीद हुए थे।

मुख्य साजिशकर्ता उमर फारूक भी 29 मार्च 2019 को नौगाम (अनंतनाग) में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया।

मुठभेड़ स्थल से बरामद उमर फारूक के सैमसंग मोबाइल फोन से एनआईए को हमले की सबसे निर्णायक फॉरेंसिक डिजिटल साक्ष्य मिले।

फोन में डार का हमला-पूर्व वीडियो, आईईडी फिटिंग की तस्वीरें, बैंक लेनदेन के स्क्रीनशॉट और पाकिस्तान में बैठे आकाओं के साथ वॉयस नोट्स सुरक्षित मिल गए।

वॉयस नोट्स में रऊफ असगर और उमर फारूक के बीच विस्फोट की तारीख तय करने और भारतीय सुरक्षा बलों के नुकसान की पुष्टि करने की बातचीत रिकॉर्ड थी।

साजिश में एक अन्य स्थानीय आतंकी मुदासिर अहमद खान (उर्फ मोहम्मद भाई) शामिल था, जो अवंतीपोरा का इलेक्ट्रीशियन था और उसने आईईडी के सर्किट जोड़े थे; वह भी मार्च 2019 में त्राल एनकाउंटर में मारा गया।

लेथपोरा के स्थानीय निवासी तारिक अहमद शाह और उसकी बेटी इंशा जान ने आतंकियों को अपने घर में पनाह दी थी और भोजन उपलब्ध कराया था।

एनआईए ने साबित किया कि पाकिस्तान से टेलीग्राम, व्हाट्सएप और सिग्नल ऐप के जरिए एन्क्रिप्टेड कोडवर्ड्स (जैसे 'ईद मुबारक' और 'खिदमत') का इस्तेमाल निर्देशों के लिए किया गया था।
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§6 खुफिया इनपुट्स, चेतावनियां और सुरक्षा समन्वय में चूक (तथ्य 64 से 75)

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हमले से पहले 8 फ़रवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर पुलिस के खुफिया विभाग (CID) ने सीआरपीएफ, सेना और बीएसएफ को एक औपचारिक 'रेड अलर्ट' पत्र भेजा था।

उस खुफिया इनपुट में स्पष्ट लिखा गया था कि जैश-ए-मोहम्मद घाटी में सुरक्षा बलों के काफिले पर आईईडी (IED) से बड़ा हमला करने की योजना बना रहा है।

9 फ़रवरी को सोशल मीडिया पर जैश के हैंडल द्वारा सोमालिया में अल-शबाब के आत्मघाती कार बम हमले का एक वीडियो सर्कुलेट किया गया था, जिसमें ठीक इसी तरह के हमले की चेतावनी दी गई थी।

खुफिया चेतावनियों के बावजूद, 14 फ़रवरी को काफिले के आगे चलने वाले 'डमी' या 'रोड क्लीयरेंस' वाहन और नागरिक यातायात के बीच भौतिक अलगाव (Physical Separation) नहीं किया गया।

एनएच-44 पर उस समय सीसीटीवी (CCTV) कैमरों का नेटवर्क बेहद सीमित था और जो कैमरे टोल प्लाजा पर लगे थे, उनका लाइव फीड कमांड सेंटर से नहीं जुड़ा था।

खुफिया विफलता केवल अलर्ट न होने की नहीं, बल्कि 'कार्रवाई योग्य इनपुट' (Actionable Tactical Intelligence) के अभाव और एजेंसियों के बीच त्वरित संचार अंतराल की थी।

जम्मू से श्रीनगर के बीच 300 किलोमीटर के सफर में काफिले को कई जगह रुकना पड़ा था, जिससे उसके समय और गति का आकलन हाईवे के किसी भी मुखबिर द्वारा आसानी से किया जा सकता था।

काफिले के बीच वाहनों की आपसी दूरी (Spacing) 20 से 30 मीटर थी, जो भारी ट्रैफिक और संकरे मोड़ों पर सिमटकर और कम हो गई थी।

काफिले के साथ कोई जैमर वाहन (Electronic Counter Measure / Jammer) नहीं था जो रेडियो-फ्रीक्वेंसी नियंत्रित डेटोनेटर को जाम कर सके।

हाईवे पर लिंक रोड्स (T-Junctions) पर पर्याप्त चेकपोस्ट या भारी ड्रॉप-गेट नहीं थे, जिससे किसी भी अनियंत्रित नागरिक वाहन का काफिले की लेन में घुसना तकनीकी रूप से संभव था।

हमले के तुरंत बाद, गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के काफिले के मूवमेंट के दौरान सभी नागरिक वाहनों के आवागमन को पूरी तरह रोकने का नया एसओपी (SOP) लागू किया।

संसद की गृह मामलों की स्थायी समिति ने बाद में अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि काफिले के आकार को छोटा रखना और सैनिकों के आवागमन के लिए वाणिज्यिक उड़ानों का तत्काल उपयोग किया जाना चाहिए था।
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§7 हमलावर दिन: 14 फ़रवरी 2019 की मिनट-दर-मिनट फॉरेंसिक टाइमलाइन (तथ्य 76 से 88)

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सुबह 03:30 बजे: 78 वाहनों का काफिला जम्मू के चन्नी हिम्मत स्थित ट्रांजिट कैंप से श्रीनगर के लिए रवाना हुआ।

दोपहर 12:30 बजे: काफिले ने रामबन और बनिहाल के जवाहर सुरंग को पार किया, जहां सुरक्षा जांच के कारण काफिले की गति धीमी हुई।

दोपहर 02:45 बजे: काफिला काजीगुंड और अनंतनाग पार करते हुए अवंतीपोरा क्षेत्र के समीप पहुंचा।

दोपहर 03:00 बजे: शाकिर बशीर ने हाजीबल में ईको कार से तिरपाल हटाया और विस्फोटक सर्किट को लाइव (Active) किया।

दोपहर 03:08 बजे: शाकिर बशीर ने लिंक रोड के मोड़ पर कार आदिल डार को सौंपी और डार ने हाईवे की ओर कार बढ़ाई।

दोपहर 03:13 बजे: काफिले की पहली चार गाड़ियां लेथपोरा में गोरीपोरा मोड़ पार कर चुकी थीं।

दोपहर 03:15 बजे: आदिल डार ने सर्विस रोड से अचानक कार को डिवाइडर कट के जरिए 5वीं बस (HR 49 F 0637) के बाईं ओर भिड़ा दिया।

03:15:02 सेकंड: एक प्रचंड विस्फोट हुआ जिसकी आवाज 10 किलोमीटर दूर त्राल और पाम्पोर तक सुनी गई।

03:16 बजे: काफिले के आगे और पीछे चल रहे जवानों ने अपनी पोजीशन ली और संभावित द्वितीयक गोलीबारी (Ambush) के डर से जवाबी फायर खोला।

03:20 बजे: स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे; पूरी सड़क मलबे, जलते टायरों और धुएं से पटी थी।

03:45 बजे: सेना की 92 बेस अस्पताल (बादामी बाग कैंट, श्रीनगर) से राहत टीमें और हेलिकॉप्टर घायलों को निकालने के लिए पहुंचे।

शाम 05:00 बजे: आधिकारिक पुष्टि आई कि 40 जवान शहीद हो चुके हैं और 5 अन्य गंभीर रूप से घायल हैं।

रात 08:00 बजे: केंद्रीय गृह मंत्री और एनआईए, एनएसजी की फॉरेंसिक टीमें नई दिल्ली से श्रीनगर के लिए विशेष विमान से रवाना हुईं।
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§8 एनआईए चार्जशीट, वैश्विक कूटनीति, बालाकोट और 5-स्टार फॉरेंसिक ऑडिट निष्कर्ष (तथ्य 89 से 100)

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25 अगस्त 2020 को एनआईए ने जम्मू की विशेष अदालत में 13,500 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट दाखिल की, जिसमें मसूद अजहर सहित 19 लोगों को नामजद किया गया।

चार्जशीट में 7 पाकिस्तानी और 12 स्थानीय कश्मीरी आतंकी/सहयोगी शामिल थे, जिनमें से 6 एनकाउंटर में मारे जा चुके थे, 7 गिरफ्तार हुए और 6 (मसूद अजहर सहित) पाकिस्तान में फरार हैं।

हमले के 12 दिन बाद, 26 फ़रवरी 2019 को भारतीय वायुसेना (IAF) ने 'ऑपरेशन बंदर' के तहत खैबर पख्तूनख्वा के बालाकोट में जैश के सबसे बड़े आतंकी प्रशिक्षण शिविर पर मिराज-2000 विमानों से 'स्पाइस-2000' सटीक बम गिराए।

27 फ़रवरी 2019 को भारत और पाकिस्तान की वायुसेनाओं के बीच हवाई झड़प हुई, जिसमें विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान का मिग-21 बाइसन दुर्घटनाग्रस्त हुआ और उन्होंने पाकिस्तान का एफ-16 मार गिराया; बाद में भारत के कूटनीतिक दबाव के चलते पाकिस्तान को उन्हें 60 घंटे के भीतर रिहा करना पड़ा।

भारत ने 15 फ़रवरी 2019 को पाकिस्तान से 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) का व्यापारिक दर्जा तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया और पाकिस्तानी आयातों पर 200% सीमा शुल्क लगा दिया।

फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) में भारत द्वारा पुलवामा हमले के तकनीकी और वित्तीय साक्ष्य पेश किए जाने के बाद पाकिस्तान को लंबे समय तक एफएटीएफ की 'ग्रे लिस्ट' में रखा गया।

अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने हमले की कड़े शब्दों में निंदा की और मई 2019 में मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी (Global Terrorist) घोषित किया।

हमले के फॉरेंसिक अध्ययन के आधार पर भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों ने अपने काफिलों के लिए बुलेटप्रूफ और माइन-प्रोटेक्टेड व्हीकल्स (MPV) की अनिवार्य तैनाती शुरू की।

एनआईए ने चार्जशीट में स्पष्ट किया कि विस्फोटक की डिलीवरी और वित्तीय लेनदेन के लिए अमेजन (Amazon) जैसी ऑनलाइन ई-कॉमर्स साइटों का इस्तेमाल बैटरी, रसायनों और दस्तानों को मंगवाने के लिए किया गया था।

अनसुलझा फॉरेंसिक सवाल: 35 किलो उच्च-ग्रेड आरडीएक्स सीमा की कड़ी फेंसिंग और लेजर सेंसर को पार करके कश्मीर घाटी के भीतरी इलाके तक कैसे पहुंचा, इसकी अंतिम जांच रिपोर्ट आज भी सार्वजनिक डोमेन में क्लासिफाइड है।

दूसरा अनुत्तरित प्रश्न: क्या जम्मू में बैक-लॉग जमा होने के बावजूद एयरलिफ्ट की अनुमति न मिलना केवल नौकरशाही की लालफीताशाही थी या गंभीर नीतिगत अनदेखी?

5-स्टार फॉरेंसिक ऑडिट निष्कर्ष: पुलवामा हमला जैश-ए-मोहम्मद का एक क्रूर और सुनियोजित सीमा-पार सैन्य-ग्रेड षड्यंत्र था, जिसे घाटी के अंदर मौजूद स्थानीय ओजीडब्ल्यू नेटवर्क और हाईवे सुरक्षा में मौजूद गंभीर संरचनात्मक कमियों का फायदा उठाकर अंजाम दिया गया।

श्रेणी (Category): Military & Defense / राष्ट्रीय सुरक्षा
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